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| ताराचंडी मंदिर का मनोरम वातावरण मन मोह लेता है |
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| माँ ताराचण्डी मंदिर |
यह भारत के 51 प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है. अपनी मनोकामनाओं के पूरी होने की लालसा में दूर-दूर से यहां भक्त आते हैं. माँ ताराचण्डी के दर्शन के लिए नवरात्री में श्रद्धालुओ का ताँता लगा रहता हैं | कथावों ग्रंथो और प्राचीन मान्यताओ के अनुसार माता के तारा रूप की पूजा यहाँ होती हैं. वैसे तो यहां सालो भर भक्तो की आना लगा रहता है, लेकिन नवरात्र मे यहा पूजा अर्चना का विशेष महत्व होता है |
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| नवरात्री में श्रद्धालुओ का ताँता |
नवरात्र में दूर-दराज से यहाँ भक्तो का आना होता हैं. कहा जाता है कि यहा आने वालो की हर मनोकामना माता रानी पूरी करती है. इसलिए लोग इसे मनोकामना सिद्धी देवी भी कहते हैं. माँ ताराचण्डी सासाराम नगर से 5 किलोमीटर दक्षिण में स्थित इस मंदिर के प्रति यहाँ के लोगो बहुत श्रद्धा और विश्वास हैं.नवरात्र मे मां के आठवें रुप की पूजा होती है. अष्टमी को मां के दरबार मे दर्शन के लिए तांता लगा रहता है. दूर-दराज से आए लोग मां के दरबार में मत्था टेकने के बाद मां से आशीर्वाद के साथा-साथ सुख समृद्धि की भी कामना करते हैं | माँ ताराचंडी विन्ध्य पर्वत के कैमूर पर्वत श्रृंखला में स्थित है | भारत के अन्य 51 पीठों में इसका स्थान प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में है.
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| माँ ताराचण्डी का दुर्लभ इतिहास |
माँ ताराचण्डी मंदिर और कथा
इस शक्तिपीठ के बारे में कहा गया है की किंवदंती सती के तीन नेत्रों में से श्री विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था, जिसे तारा शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम तारा रखा था. दरअसल, यहीं पर परशुराम ने सहस्त्रबाहु को पराजित कर मां तारा की उपासना की थी. मां ताराचंडी इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थीं.




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