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| भटकती रहीं, 2 मदर्स ऑफ सासाराम |
ये सासाराम रेलवे स्टेशन पर रविवार को भटकती वो माताएँ है जो आजकल लाॅक डाउन में दाने दाने को मोहताज हैं । इनकी संतानों ने तो इन्हें त्याग ही दिया है हमारे निर्मम सिस्टम में भी इनके लिए कुछ नहीं है।
पिछले कई दिनों से सासाराम के रेलवे स्टेशन पर ऐसे हीं भटकते हुए पाई जाति हैं । कोई समाजसेवी खाना लेकर जाता है ,और इनपर नजर पड़ती है तो इन्हे भी भोजन मिल जाता है , वर्ना भगवान ही मालिक रहता है उस दिन के लिए । सरकारी सिस्टम भी इस मामले में सुस्त है, शहर में ऐसे कई लोग घूमते हुए अक्सर मिल जाते हैं , जिनका कोई भी अपना नहीं होता । ऐसे लोगों के लिए सरकारी वृद्धाश्रमों की भी समुचित व्यवस्था नहीं है , जहां इनका प्रॉपर देख भाल किया जा सके ।
पिछले वर्ष की बात है, दिवाली के दिन शाम को ऐसे ही घूमते हुए रेलवे स्टेशन गया था तो ,अचानक मेरी नजर जमीन पर लेटे एक वृद्ध पर पड़ गई थी । मैंने उससे पूछा तो ,उसने बताया कि इसी शहर का रहने वाला था । जिसे उसके 2 बेटों ने घर से निकाल दिया था । वह कई दिनों से वहीं पड़ा हुआ था, फिर मैंने उसके घर वालों तक खबर भेजवाया तो ,उसके घर वाले आ कर ले गए । पूछने पर पारिवारिक विवाद मालूम चला । खैर जो भी हो , इस तरह की घटनाओं को किसी भी तरह से सभ्य समाज में सही नहीं ठहराया जा सकता है ।
इन सब चीजों में सबसे बड़ी गलती तो समाज और परिवारों का ही होता है, जहां वृद्धों की कद्र नहीं होती ।
सिस्टम का भी दोष कम नहीं है ,क्यूंकि आजाद मुल्क भारत में अपनी सरकारें और अधिकारियों के होते हुए भी इन लोगों के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन पाते हैं ।
जब तक अंग्रेज थें , उस समय ये मान लिया जाता था कि वो अपने नहीं है । लेकिन आजादी के बाद कई सरकारें आई गई ,किसी ने इस ओर ठोस पहल नहीं किया । कुछ कानून जरूर बनें ,लेकिन उसको अमलीजामा पहनाया नहीं जा सका । तभी तो आए दिन ,छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों तक से इस तरह की मन को विचलित करने वाली ख़बरें आते रहते हैं ।
तस्वीर : बृजेश जी (जॉर्नलिस्ट )
तस्वीर : बृजेश जी (जॉर्नलिस्ट )

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